Wednesday, 17 April 2013

Yaadon ki gullak...

यादों की गुल्लक

दिल में छुपाकर एक कोने में,
छोटी सी गुल्लक है मेरे यादों की.
सिक्के नहीं उसमे चांदी या सोने के,
यादे हैं भूले प्यार और वादों की.

कभी ख्याल आया की उसको,
खान्खानाऊ और आवाज़ सुनूँ.
भर रखा था अब तक जिसका,
उसमे से कुछ पल ख़ास चुनुं.

झाँकने की कोशिश की गुल्लक के अंदर,
घने यादों के बादल थे और खिलौनो के रंग.
कुछ यादें धुंधली कुछ बहुत सुंदर,
कुछ पल अकेले, कुछ बिताये दोस्तों के संग.

फूट न जाए गुल्लक यादों से भरी,
सोचा एक बार अभी और भर सकती है.
लम्हों से बंधी यादों की नाज़ुक कड़ी,
गिरकर ज़मीन पर टूट सकती है.

गिरी जब गुल्लक आवाज़ नहीं आई,
घेरने लगी मुझे मेरी तन्हाई.

कुछ यादें जिन्हें मैं गई थी भूल,
दादीजी की कहानियां और गुड़ियों का खेल.
जैसे किताब में दबा गुलाब का फूल,
सूखकर भी याद दिलादे दिलों का मेल.

समेटकर रखलूँ यादें सारी,
जाने गुल्लक फिर कब तक भरे.
वक़्त का पलड़ा कब पद जाए भारी,
फिसल जाए हाथों से सब रेत की तरह.

पल दो पल मुट्ठी में बाँध लूं आज,
जब सांसें थमे, इन्हीं का थाम लूं हाथ.

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